Why we are suffering from life style disease? A Story.



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Please translate someone for non Hindi friends. I hope it is much useful...

Teachers are now in ad agencies not in schools.

इस कहानी को जो व्यक्ति टार्गेट अचीव कर लेने वाले दस मार्केटिंग लीडरों तक पहूँचाएगा वह सामाजिक रूपांतरण के लिए अनजाने में ही भागीदार बनकर पूण्य लाभ कमायेगा ।


राजस्थान के नगरों में नेपाल से कुछ लोग मजदूरी के लिए आते हैं । स्वेच्छा से चोकीदारी करने लगते हैं ।

ईमानदारी से काम करते हैं । किसी का घर, दुकान रात को गलती से खुला रह जाता है तो जगाकर दरवाजा बन्द कर लेने या ताला लगाने के लिए बोल देता है, किसी को बाहर ट्यूर पर जाना होता है तो रात के लिए उसे बच्चों और घर का ध्यान रखने के लिए बोल दिया जाता है, किसी घर में बुढिया अकेली रहती है बच्चे बड़े शहर में कमाते हैं, कोई स्कूटर साइकिल बाहर रह जाती है तो उसे उनकी रात भर चिंता रहती है ।

लगन और ईमानदारी से काम करता है, इसके सपने भी होंगे कि नगर वासियों की तरह इसका भी कोई घर हो, पैसा हो, गाड़ी हो ।

महीने के अंत में यह चोकीदार जब गली मोहल्ले में दो-दो, पाँच-पाँच रूपये इकट्ठे करने के लिए घर दुकानों पर जाता है तो कुछ लोग पैसा दे देते हैं, कुछ बोलते हैं अगले महीने ले जाना, कोई कहता है मैं क्यों दूँ मैने क्या तुम्हे कहा है कि मेरी चोकीदारी करो ? कोई कहता है कि तुम पहरा तो देते ही नही रात को, पैसा इकट्ठा करने आ जाते हो दिन के समय, बड़ी मुश्किल से एक ईमानदार आदमी का गुजारा हो पाता है ।

करीब 400-500 घर दुकानों पर शायद एक आदमी चोकीदारी करता है ।

एक दिन एक चोर नगर में आता है और सीधे चोकीदार के घर जाकर उसे कहता है कि जो चिंताएं तुम नगर वासियों के लिए करते हो वे केवल मेरे लिए करो, लापरवाहियों, लाचारियों की जो सूचनाएं तुम्हारे पास हो वो नगर वासियों के लिए नही मेरे लिए काम में लो । नगर के 400-500 लोग मिल कर तुम्हारा पेट नही भर सकते, मेरा अकेले का साथ दो जल्दी अमीर बन जाओगे । चोकीदार सोच समझकर चोर का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है ।

अब चोकीदार ज्यादा मुस्तैदी से पहरा देता है, ज्यादा सतर्क निगाहों से घरों दुकानों की पड़्ताल करता है पर रात को चोरियाँ होनी शुरू हो गई है । पहरेदार की सीटियों की आवाज रातों को सुनाई देती है पर चोरियाँ है कि रुकने का नाम ही नही लेती ।

जिम्मेदार कौन ? बच्चों के जेबखर्च पर सैंकड़ों लुटा देने वाले लोग जो सब मिल कर एक मजदूर का पेट नही भर सके ? चोकीदार ? चोर ? पुलिस ? प्रशासन ?

शिक्षक रूपी चोकीदार बच्चों की अज्ञान, भय, लालच, अनुचित तर्क जैसी कमजोर खिड़कियों का रखवाला होता है पर शिक्षक का सम्मान व मजदूरी इस तरह की है कि शिक्षक होना आज जीविकोपार्जन का अंतिम व मजबूरी का जरिया है ।

प्राईवेट स्कूलों की दीवारें व भवन तो मजबूत हो रहे हैं पर शिक्षक 1000/1500 रूपये महीने में वर्ष के 8 महीने के लिए काम करने वाले थोक के भाव मिलते हैं । जीभ की मजदूरी, हाथ की मजदूरी से सस्ती हो रही है । मनोविज्ञान के जानकार सच्चे शिक्षक आज जिनको विद्यालयों में होना चाहिए विज्ञापन कम्पनियों में काम करते हैं । वे अच्छी तरह से जानते हैं कि तर्क, लालच, भय, अज्ञान को कैसे नकद किया जा सकता है ।

दुप्पट्टे और बालों की लचक 5 डिग्री कम या अधिक होते ही चॉकलेट कम्पने की चॉकलेट बिक्री में कितनी कमी या अधिकता होती है पहले से ही नापा जा सकता है, इतने कुशल मनोवैज्ञानिकों का उपयोग आज कोन कर रहा है, किसी से छुपा नही है ।

जिस शिक्षा को प्राथमिक स्कूलों का हिस्सा होनी चाहिए उसे उच्च शिक्षा के नाम पर कॉर्पोरेट वर्ल्ड के लोग केवल ऎँम बी ए जैसे पाठ्यक्रमों के लिए सुरक्षित रखे हुए है ।

उपभोक्ता शिक्षा के नाम पर स्कूलों में बाट व माप पढाये जाते हैं जब कि बाजार युद्ध के लिए तैयार किये जाने वाले योद्धाओं को बताया जाता है कि लालच को कैसे नकद करें? अज्ञानता को कैसे नकद करें ? व्यक्तित्व के भय को कैसे नकद करें ? तर्क शीलों का शील कैसे हरण करें ?

( क्या इनको चोरों की जमात कहना ठीक रहेगा ? या ब्राण्ड का बैल्ट बान्धे हुए शिकारी कुत्ते जो ऐसे घरों में मोबाइल बेच जाते हैं जिनके घर में खाने को रोटी नही, जिनकी बहनें धन के अभाव में अनब्याही बैठी है उन भाईयों को किश्तों पर गाड़ी दे आना इनके बांये हाथ का खेल है । अपने ही भाईयों को नोच कर खा जाने के लिए प्रशिक्षित किये ये लोग जानते तक नही कि जिनके लिए ये काम करते हैं वो आखिर छुप कर बैठा कहाँ है ? नगर, शहर में उन अनजान लोगों की ब्रांड पोजिशनिंग के लिए ये छोटे छोटे लाचार किये गये चोकीदार अपने ही बजूद की आहूति दे देते हैं । जीवन के अंत में इनको इनके नाम से पड़ोसी भी नही पहचानते । क्यों कि ग्राहकों का तो पीते ही हैं, इनका भी खून पी पीकर कॉर्पोरेट मोटे होते जाते हैं, ब्राण्ड पॉपुलरिटी तो कॉर्पोरेट की बढ़्ती है। )

मार्केटिंग गुरू फिलिप कोटलर का कहना है कि भविष्य का सच्चा शिक्षक व आध्यात्मिक व्यक्ति मार्केटिंग परसन होगा । पर उसके आध्यात्मिक होने तक तो वह अपने ही पता नही कितने मित्रों, रिश्तेदारों, समाजों को लील चुका होगा ।
पर गलती भी तो आखिर उसी आम नागरिक की है जिसने चोकीदार के काम की इज्जत नही की । अब वही सजा भी पा रहा है । भुगतो !!

2 comments:

  1. Bhut he sundar Kataksh Hai bandhu.... dimak ke batte jaladene wala..... Dghanya wad ... likhte rehaiya , sadhuwad ke sath punah dhanyawad.

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  2. अनुरागMarch 29, 2014 at 11:29 PM

    बहुत सही और सार्थक ! एक स्पष्ट सन्देश है आपकी पोस्ट में ! इस पोस्ट को प्रमुख समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित होना चाहिए !

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