Journalists through print and electronic media communicate to mass. For journalists society is boundryless and borderless classroom. They are 100s times powerful then a teacher in class. It is not good for country to keep them under self policing. Board of selected university chancellors, leading educator etc must look after the media houses either owns private or govts. Each info aired or printed is not only an info it has certain impact on user of info. Owner of media know it very well and he/she use it with a certain agenda in mind. Please take it serious and do needful for the interest of our country.
(Authorized & Affiliated with A unit under Dept. of Sc. & Tech., Govt. of India)
BSE, NSE can do a good for helpless world while trading...
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सरल भाषा में तो इसे कहें कि सट्टे को घर घर फैला दिया जाए तो आपत्ति क्या है? पर सट्टा किस पर हो इसका निर्णय कर लिया जाए। गाँव के बच्चों की शिक्षा पर सट्टा करो, स्कूल के रिजल्ट पर सट्टा करो, पूर्ण साक्षरता के दर्जे पर सट्टा करो, विषय वार प्रवीणता पर सट्टा करो, खेलों के व्यक्तिगत और दलगत प्रदर्शन पर सट्टा करो, वार्डों, शहरों की सफाई पर सट्टा करो, राज्यों की सफाई के स्तर पर सट्टा करो, स्वास्थ्य के स्केल बनाओ और उन पर सट्टा करो, क्राइम फ्री शहर, प्रांत आदि पर सट्टा करो। अरे गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं क्रीड़ाओं में द्यूत क्रीड़ा मैं हूँ। दुनिया में होने वाली प्रतिदिन कुल बिलिंग का आकलन किया जाए तो ये कपड़े, रोटी, मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए नही होती बल्कि शेयर मार्केट, कॉमोडिटी एक्सचेंज, खेल पर सट्टे आदि पर होती है। जीवन में आने वाले आर्थिक भूचाल इस सट्टे की ही कृपा से आते हैं। क्यों कि यह वासुदेव कृष्ण का ही शक्ति रूप है। जो वस्तु, सेवा (एनर्जी, मनोरंजन) इसके आश्रय आ गये वे कीमती हो गये। सब लोग उसे पाने के लिए लालायित हो उठे। अब सोचिये... सामाजिक मुद्दों के परफोर्मेंस इंडीकेटर बना दिये जाएं, इंडेक्स बना दिये जाए तो क्या सब उस इंडिकेटर पर काम करने लगेंगे या नही? फ्यूचर एण्ड ऑप्शन ट्रेडिंग, कॉल और पुट की इंट्रिंसिक वेल्यु और टाइम वेल्यु की गणना कर सकने में सक्षम लोग, फोर्वार्ड मार्केटिंग कमीशन और सेबी जैसे नियामक प्राधिकरण चाहे तो आसमान से तारे तोड़ कर ला सकते हैं। घर घर सर्वे करा लो चाहे, पूरा देश राजी होगा इस सट्टे के लिए। एन एस ई, बी एस ई जैसे निगमों का भी अस्तित्व धन्य हो जाएगा। सेबी बोर्ड के एक सदस्य एजुकेशन सर्टिफिकेट की रिपोजिट्री बनाने की कल्पना कर रहे हैं। ये जिनके मन में आई है उन तक ये सम्वाद पहुँचे तो मैं इस काम के लिए उनसे चेयर स्पोंसरशिप और सेक्रेटेरियल किसी सक्षम आदमी के लिए चाहूँगा। धरती पर इंडिया राज करेगा ...
परीक्षा कॉपियों के मुल्यांकन हेतु सुझाव...
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बोर्ड और विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं में कॉपी के आखरी पन्ने पर छात्र से लिखवाया जाना चाहिए कि उसने कितने प्रतिशत अंक की अपेक्षा की है। साथ ही मुल्यांकन में उसे ± बताने की भी छूट मिले। अर्थात वह ये भी कहे कि मुल्यांकन के मतभेद के कारण कितने प्रतिशत अंक कम या अधिक हो सकते हैं। जब परीक्षक कॉपी जाँचे तो उसे उस उत्तरपुस्तिका की एक अनुमानित स्थिति का पता चल जाएगा। स्व मुल्याँकन को भी प्रोत्साहन मिलेगा। शिक्षक कॉपी जाँचते समय अपने मुल्याँकन का भी मुल्याँकन कर सकेगा कि कहीं लापरवाही, बेइमानी या बदले की भावना से मुल्याँकन कम या अधिक तो नही हो रहा है। सूचना के अधिकार और अदालतों के दखल की नोबत ही नही आएगी। वरना आज हर बोर्ड और विश्व विद्यालय की मुल्याँकन प्रणाली सवालों के घेरे में है। जनता भले ही अन्दर की बात नही जानती होगी पर शिक्षक और विद्यार्थी ये भली भाँती जानते हैं ...
आरक्षण का अनकहा पहलु...
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अगर मैं देश का उद्योगपति होता, प्रमुख उद्योगपति होता जिसके सहयोग बगैर सरकार का टिका रहना असम्भव होता तो मैं भी आरक्षण जैसे माध्यम से ही शासन तंत्र को कमजोर कर देता, जिम्मेदार पदों को कमयोग्य व्यक्तियों के लिए आरक्षित कर देता। खेमका या दुर्गाशक्ति जैसी सोच के लोग अगर सब जगह पहूँच जाते तो? कल्पना मात्र से मन सिहर उठता है। आरक्षण की नीति से पिछड़े के विकास का मेरा क्या लेना देना? अगर सचमुच ही कुछ लेना देना होता तो अब तक करवा नही दिया होता? अरे प्रोमोशन में आरक्षण, नियुक्तियों में आरक्षण की ये सब नीतियाँ इस लिए है ताकि मेरे कामकाज पर सवाल उठा सकने वाले योग्य अधिकारियों को सबीज नष्ट कर दूँ। देश का मुश्किल से उपलब्ध योग्य मानव संसाधन भला देश चलाए ये मैं कैसे बर्दास्त कर सकता हूँ? उनको तो मेरे उद्योगधन्धों की सरकार से रक्षा करने के लिए जरूरत है। अपने ही खिलाफ योग्य नीति निर्माताओं, कर संग्राहकों की फोज खड़ी कर लूँ? ना, भाई ना। राजनीति में पढे लिखे नागरिकों को चुन कर आने की जरूरत? क्यों मेरी ही कब्र अपने ही हाथों खुदवाना चाहते हो? भला प्राकृतिक संसाधनों पर स्वामित्व मेरा ना होग तो क्या मुर्खों के देश का होगा? मुंशी प्रेमचन्द की लिखी “नमक का दरोगा” कहानी के निहितार्थ मैंने ही तो समझे हैं, जन साधारण को समझने की क्या जरूरत है?
मेरे जैसा बेरोजगार आदमी भी जब इतनी दूर की सोच सकता है तो क्या स्थापित उद्योगपतियों का कबीला मेरे से कम समझदार है?
मेरे जैसा बेरोजगार आदमी भी जब इतनी दूर की सोच सकता है तो क्या स्थापित उद्योगपतियों का कबीला मेरे से कम समझदार है?
शिक्षा पर चर्चा का खुला मंच बनें...
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मेरी राय में शिक्षा के उपभोक्ता अर्थात् विद्यार्थी और उसके लिए धन खर्च करने वाले अभिभावक के लिए किसी पोर्टल पर शिक्षाविदों, अधिकारियों से आवश्यक चर्चा की व्यवस्था नही होगी तो शिक्षा सुधार के सम्वाद चल पाना कठिन होगा। ये तो वैसे ही हुआ जैसे खिलाड़ी अभ्यास के लिए डमी के साथ खेल रहा हो। असली परीक्षा तो मैदान में होती है। स्कूलों का ढाँचा भी कमोबेश ऐसा ही है बच्चों की प्रश्न पूछने की क्षमता नष्ट कर दी जाती है, आज्ञा पालन की क्षमता की परीक्षा होती है। भला कोई क्रिकेटर अपने ही हाथ से उछाली गेन्द पर खेलता रहे तो उसे क्रिकेट मैच कहेंगे क्या? कोई पहलवान अगर अपने शिष्य से अपने ही बताए दाँव पर सुरक्षित खेले, जीते और शेखी बघारता रहे तो वह अपने शिष्य के साथ दगा ही कर रहा है। कक्षा में आज शिक्षक बच्चे के पूछे प्रश्न का जबाब देने की स्थिति में भी नही है। बस अखाड़े पर कब्जा जमाए बैठे हैं। हर शिष्य बाहर की दुनिया में फैल है। मजे की बात है कि सरकार इन पहलवानों को संरक्षण भी दे रही है...
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